अमेरिकी प्रकाशन पॉलिटिको की ताज़ा रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पांच बड़े देशों अमेरिका, भारत, रूस, चीन और जापान का एक नया कमिटी बनाने की योजना पर विचार कर रहे हैं। इस समूह का नाम ‘C-5’ या कोर फाइव रखा गया है, जिसमें भारत को एक प्रमुख शक्ति के रूप में शामिल किया गया है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ विवादों की वजह से रिश्तों में तनाव आया था। माना जा रहा है कि ट्रंप इस नए समूह के जरिए भारत के साथ अपने रिश्ते सुधारने और एशिया में अमेरिका का प्रभाव फिर से बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
चीन और रूस से रिश्तों को रीसेट करने की कोशिश
इस प्रस्ताव से यह भी संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन चीन और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ अपने संबंधों को नए तरीके से सुधारने की योजना बना रहा है। पूर्वी एशिया में अमेरिका का प्रभाव कम होता जा रहा है, खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव और रूस की आक्रामक नीतियों के कारण। ऐसे में, वॉशिंगटन अपनी कूटनीतिक स्थिति को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। ‘C-5’ समूह के गठन से अमेरिका को भारत, चीन और रूस जैसी तीन बड़ी एशियाई शक्तियों के साथ एक ही मंच पर बातचीत का मौका मिलेगा।
G7 को चुनौती? यूरोप को बाहर रखकर नया शक्ति-समीकरण
इस प्रस्तावित C-5 समूह की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें यूरोप को कोई स्थान नहीं दिया गया है, जिससे यूरोपीय देशों में असंतोष और चिंता का माहौल बन सकता है। “यह नया मॉडल मौजूदा G7 और G20 जैसे लोकतांत्रिक मंचों से बिल्कुल अलग होगा, क्योंकि इसमें देशों के लोकतांत्रिक या संपन्न होने की कोई शर्त नहीं होगी।”
रिपोर्ट्स के अनुसार, “इस प्रस्ताव का मतलब यह हो सकता है कि अमेरिका रूस को यूरोप में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्वीकार कर रहा है, जिससे NATO और पश्चिमी देशों की एकता को खतरा हो सकता है।” यह कदम तानाशाहों का वैधीकरण भी हो सकता है। वहीं, इसके समर्थक यह तर्क देते हैं कि बहुध्रुवीय दुनिया में पुराने अंतरराष्ट्रीय मंच अब पर्याप्त नहीं हैं, और नया C-5 समूह बदलाव की दिशा में एक जरूरी कदम हो सकता है।
‘सुपरक्लब’ में स्थायी सीट या लोकतांत्रिक गठबंधनों से दूरी?
भारत के लिए C-5 समूह का प्रस्ताव एक तरफ सोने पर सुहागा साबित हो सकता है, तो दूसरी तरफ यह एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती भी हो सकता है। यदि भारत इस समूह का हिस्सा बनता है, तो उसे वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक स्थायी और प्रभावी स्थान मिल सकता है। चीन और रूस जैसे देशों के साथ बैठकर भारत बड़े क्षेत्रीय मुद्दों पर बातचीत करने का अवसर प्राप्त कर सकता है, जो उसे वैश्विक नेतृत्व की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। हालांकि, दूसरी तरफ, इस कदम से भारत के पारंपरिक लोकतांत्रिक साझेदारों, खासकर यूरोप और अमेरिका के मौजूदा गठबंधनों से दूरी बढ़ सकती है। भारत को यह निर्णय लेना होगा कि क्या वह इस नए शक्ति ब्लॉक का हिस्सा बनकर वैश्विक मंच पर अधिक प्रभाव चाहता है, या फिर वह अपनी मौजूदा साझेदारियों के दायरे में रहते हुए संतुलन बनाए रखना चाहता है।
फिलहाल, व्हाइट हाउस ने इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार यह विचार ट्रंप के भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से मेल खाता है, और यह भविष्य में दुनिया की राजनीति की दिशा को बदल सकता है।
Keywords: C-5 Superclub, India-US Relations, Global Power Balance