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दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की फीस पर लगा लगाम, नया बिल हुआ पास लेकिन अभिभावक क्यों हैं नाराज?

शिक्षा दिल्ली
fees of private schools in delhi are curbed new bill has been passed but why are parents angry 1

दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की फीस में भारी बढ़ोतरी की शिकायतों के बाद सरकार ने कड़ा कदम उठाया है। पिछले हफ्ते दिल्ली विधानसभा ने दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और नियमन में पारदर्शिता) बिल, 2025 पास किया। इस बिल को शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने पेश किया था। अब इसे उपराज्यपाल वी के सक्सेना की मंजूरी के लिए भेजा गया है। बता दें कि ये कदम अप्रैल 2025 में नए स्कूल सत्र की शुरुआत में कई निजी स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाने के बाद अभिभावकों के बड़े विरोध प्रदर्शनों के तीन महीने बाद आया है।

क्या है इस बिल का मकसद?

इस बिल का मकसद दिल्ली के सभी मान्यता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नजर रखना और शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को रोकना है। इसके लिए तीन स्तरों की व्यवस्था बनाई गई है। पहला स्तर है स्कूल स्तर की फीस नियमन समिति, जिसे हर साल 15 जुलाई तक बनाना अनिवार्य होगा। इस समिति में स्कूल प्रबंधन का एक प्रतिनिधि अध्यक्ष होगा और प्रिंसिपल सचिव की भूमिका निभाएंगे। समिति में पांच अभिभावक, जो पैरेंट-टीचर एसोसिएशन से लॉटरी के जरिए चुने जाएंगे, तीन शिक्षक और शिक्षा निदेशक का एक प्रतिनिधि शामिल होगा। इसमें एक सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति या सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग से होगा और कम से कम दो महिलाएं होंगी। ये समिति हर साल 15 अगस्त से पहले मिलकर अगले शैक्षिक सत्र की फीस को सर्वसम्मति से मंजूरी देगी। मंजूर की गई फीस को तीन साल तक नहीं बदला जा सकता।

दूसरा स्तर है जिला फीस अपीलीय समिति, जो शिकायतों का समाधान करेगी। हर जिले में ये समिति बनेगी, जिसमें जिला शिक्षा उपनिदेशक अध्यक्ष होंगे। इसमें एक चार्टर्ड अकाउंटेंट या जिला लेखा अधिकारी, दो स्कूल प्रतिनिधि और दो अभिभावक प्रतिनिधि होंगे। फीस से असंतुष्ट होने पर 15 प्रतिशत अभिभावकों को एक साथ शिकायत दर्ज करानी होगी। ये समिति गवाह बुला सकती है, दस्तावेज मांग सकती है और सबूतों की जांच कर सकती है।

तीसरा स्तर है राज्य स्तर की संशोधन समिति, जिसके अध्यक्ष शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा योगदान देने वाले व्यक्ति होंगे। इसमें एक चार्टर्ड अकाउंटेंट, लेखा नियंत्रक, स्कूल और अभिभावक प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस समिति के आदेश तीन साल तक मान्य रहेंगे।

बिल में उल्लंघन के लिए सख्त सजा है। पहली बार गलती पर एक लाख से पांच लाख रुपये और दोबारा गलती पर दो लाख से 10 लाख रुपये तक जुर्माना होगा। बार-बार उल्लंघन पर स्कूल की मान्यता रद्द हो सकती है, फीस बढ़ाने का अधिकार छीना जा सकता है या स्कूल का प्रबंधन सरकार के हाथ में लिया जा सकता है। छात्रों को परेशान करने, जैसे परीक्षा परिणाम रोकने या कक्षा में हिस्सा लेने से रोकने पर प्रति छात्र 50,000 रुपये का जुर्माना लगेगा।

अभिभावक क्यों नाराज हैं?

अभिभावकों में इस बिल को लेकर नाराजगी है। उनका कहना है कि इस साल की फीस बढ़ोतरी को वापस लेने या दोबारा जांच का कोई प्रावधान नहीं है। स्कूल स्तर की समिति में स्कूल प्रबंधन का दबदबा है और अभिभावकों का चयन लॉटरी से होता है, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। पहले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश से बनी समितियां व्यक्तिगत शिकायतें सुनती थीं, लेकिन अब 15 प्रतिशत अभिभावकों की जरूरत ने शिकायत का रास्ता मुश्किल कर दिया है।

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