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मरने के बाद शव के कर देते है 108 टुकड़े, जानें भारत में आज भी हैरान कर देने वाली इन परंपराओं के बारे में

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shaving the body into 108 pieces strange funeral traditions in india

भारत एक ऐसा देश है जहां कई तरह की संस्कृतियां, धर्म और परंपराएं मिलती हैं। ये विविधताएं अंतिम संस्कार की प्रथाओं में भी साफ दिखती हैं। कुछ जगहों पर पारंपरिक तरीके से शव का दाह संस्कार होता है, तो कहीं प्रकृति के साथ जुड़ी अनोखी रीतियां निभाई जाती हैं। यहां कुछ ऐसे अजीब और रोचक अंतिम संस्कार होते हैं जिन्हें सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। इन अनोखी प्रथाओं से पता चलता है कि भारत में मृत्यु को केवल अंत नहीं, बल्कि जीवन के नए सफर की शुरुआत माना जाता है। आइए, जानते हैं ऐसी दिलचस्प कहानियाों के बारे में।

1) अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल प्रदेश के तवांग और पश्चिम कामेंग जिलों में रहने वाली मोनपा आदिवासी जनजाति की एक अनोखी और दिलचस्प अंतिम संस्कार की परंपरा है। यहां की खास बात यह है कि वे अपने मृतक के शव को 108 टुकड़ों में काटकर नदियों या तालाबों में मछलियों को देते हैं। ऐसा करने का मतलब है कि शव पूरी तरह से प्रकृति के चक्र में वापस लौट जाए। मोनपा लोग मानते हैं कि इससे मृतक की आत्मा को शांति मिलती है और वह अगले जन्म के लिए तैयार हो जाती है। शव को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मछलियों को खिलाना एक तरह से जीवन और मृत्यु के चक्र को जोड़ने का तरीका है। इस अनोखी विधि को लेकर ‘वाटर ब्यूरीअल’ नाम की एक प्रसिद्ध फिल्म भी बनाई गई है, जिसने इस रीति को नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर पहचान दिलाई।

2) तमिलनाडु

तमिलनाडु के दलित समुदाय की अंतिम संस्कार प्रथाएं बहुत ही खास और अलग होती हैं, जो उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को दर्शाती हैं। यहां अंतिम संस्कार के दौरान लोग गाना-बजाना करते हैं और बैंड-बाजा के साथ शव को अंतिम यात्रा पर ले जाया जाता है। यह एक सामूहिक आयोजन होता है, जहां पूरा गांव एक साथ जुटकर मृतक को विदाई देता है। शव यात्रा के दौरान खास लोकगीत गाए जाते हैं, जो मृतक की आत्मा की शांति और उसके अच्छे पुनर्जन्म के लिए होते हैं। कुछ इलाकों में तंत्र-मंत्र और लोक पूजा भी की जाती है, जो मृतक की आत्मा को सही मार्ग दिखाने और बुरी आत्माओं से बचाने के लिए होती हैं।

3) पारसी

पारसी समुदाय की अंतिम संस्कार की परंपरा भारत में बहुत ही अनोखी और अलग है। पारसी लोग अपने मृतकों का शव जलाने (दाह संस्कार) के बजाय उसे “टावर ऑफ साइलेंस” यानी “मौन मीनार” में रखते हैं। यहां शव को खुला छोड़ दिया जाता है ताकि गिद्ध और अन्य पक्षी उसे खा जाएं। यह तरीका पारसी धर्म की खास मान्यता पर आधारित है, जो कहती है कि मृत शरीर को जमीन, आग या पानी के साथ प्रदूषित नहीं करना चाहिए। पारसी समुदाय मानता है कि शरीर केवल एक अस्थायी वस्तु है और आत्मा अमर होती है। इसलिए वे शव को प्राकृतिक रूप से नष्ट होने देते हैं। गिद्धों द्वारा शव का साफ़-सफाई करना, मृत्यु को प्रकृति के चक्र में वापस लौटाने जैसा माना जाता है। यह परंपरा बहुत पुरानी है और आज भी मुंबई, पाटणा और अन्य पारसी बस्तियों में इस तरह अंतिम संस्कार होते हैं।

4) राजस्थान

राजस्थान के ऊपरी जाति परिवारों में एक अनोखी और दिलचस्प अंतिम संस्कार की प्रथा थी, जहां महिलाओं को अंतिम संस्कार के दौरान रोना मना था। समाज में माना जाता था कि यदि परिवार की महिलाएं शोक मनाएंगी या जोर-जोर से रोएंगी तो इससे मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। इसलिए, परिवार में मौजूद महिलाएं अपनी भावनाओं को दबाकर चुप रहती थीं। ऐसे में, परिवार बाहर से “रुदालियां” नामक पेशेवर शोक स्त्रियों को बुलाता था, जो खास तौर पर अंतिम संस्कार के समय रोने और शोक मनाने के लिए आती थीं। ये रुदालियां अपनी आवाज़ में दुःख और दर्द बयां करती थीं, जिससे परिवार वालों को राहत मिलती थी और परंपरा भी पूरी होती थी। आज के समय में यह प्रथा धीरे-धीरे खत्म हो रही है, लेकिन इतिहास में यह एक रोचक और अनोखी परंपरा के रूप में जानी जाती है।

5) भारत के कुछ समुद्री इलाकों और मछुआरा समुदायों में एक बहुत ही अनोखी अंतिम संस्कार की परंपरा है। अगर किसी व्यक्ति की मौत सांप के काटने से हो जाती है, तो उसके शव को दफनाया या जलाया नहीं जाता, बल्कि समुद्र में बहा दिया जाता है। वहां के लोगों का मानना है कि समुद्र का खारा पानी जहरीले ज़हर को धो देता है और इससे मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है। उनका यह भी विश्वास होता है कि मृत शरीर को समुद्र में छोड़ने से वह फिर से प्रकृति में मिल जाता है, और यही जीवन-मरण का सही तरीका है। यह परंपरा खासतौर पर उन लोगों के बीच पाई जाती है जिनका जीवन समुद्र और मछलियों से जुड़ा होता है।

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