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सुप्रीम कोर्ट ने धार भोजशाला में बसंत पंचमी पूजा के लिए तय किए अलग-अलग समय, जानिए क्या है भोजशाला विवाद

कानूनी खबरें भारत
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नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला में बसंत पंचमी की पूजा और जुमे की नमाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने दोनों पक्षों को सलाह देते हुए कहा कि हिंदू पक्ष पूजा दोपहर 12 बजे और शाम 4 बजे कर सकता है। वहीं नमाज को लेकर याचिकाकर्ता की ओर से सुझाव दिया गया कि इसे शाम 5 बजे के बाद कराया जाए। सुनवाई के दौरान हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली। मुस्लिम पक्ष के वकील ने साफ कहा कि जुमे की नमाज का समय पहले से निर्धारित होता है और इसमें बदलाव संभव नहीं है।

इस मामले में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस नामक संगठन ने याचिका दाखिल कर मांग की है कि बसंत पंचमी के दिन मुसलमानों को संबंधित स्थल पर नमाज अदा करने से रोका जाए। याचिका में दलील दी गई है कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) के आदेश के अनुसार हिंदू श्रद्धालुओं को हर मंगलवार और बसंत पंचमी के अवसर पर पूजा की अनुमति है, जबकि मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई है।

संगठन का कहना है कि वर्ष 2003 में जारी आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़े, तो धार्मिक गतिविधियों का संचालन किस तरह किया जाएगा।

बसंत पंचमी–जुमे की नमाज को लेकर कोर्ट में बहस

  • याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि 23 जनवरी को बसंत पंचमी के अवसर पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा और हवन होगा।
  • याचिका में यह मांग रखी गई कि क्या जुमे की नमाज शाम 5 बजे के बाद कराई जा सकती है।
  • मुस्लिम पक्ष के वकील ने कहा कि जुमे की नमाज का समय तय होता है, जो दोपहर 1 से 3 बजे के बीच ही होता है।
  • वकील ने स्पष्ट किया कि नमाज के तुरंत बाद मुस्लिम पक्ष स्थल खाली कर देगा।
  • उन्होंने यह भी कहा कि अन्य नमाजों के समय में बदलाव संभव है, लेकिन जुमे की नमाज के समय में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

विवाद की जड़ क्या है?

हिंदू संगठनों का दावा है कि भोजशाला मूल रूप से राजा भोज के काल की धार्मिक और शैक्षणिक इमारत है, जिसे सरस्वती मंदिर के रूप में पूजा जाता रहा है। उनका कहना है कि मध्यकाल में मुस्लिमों को यहां सीमित समय के लिए नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी। वहीं, मुस्लिम समाज का पक्ष है कि वे वर्षों से यहां नियमित रूप से नमाज अदा करते आ रहे हैं और वे इस स्थल को भोजशाला–कमाल मौलाना मस्जिद के नाम से जानते हैं।

भोजशाला का इतिहास

धार क्षेत्र पर प्राचीन काल में परमार वंश का शासन था। वर्ष 1000 से 1055 ईस्वी के बीच राजा भोज ने यहां शासन किया, जिन्हें विद्या और संस्कृति का महान संरक्षक माना जाता है। राजा भोज देवी सरस्वती के परम उपासक थे। वर्ष 1034 ईस्वी में उन्होंने शिक्षा के प्रचार के लिए यहां एक विशाल विद्यापीठ की स्थापना कराई, जो आगे चलकर ‘भोजशाला’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। हिंदू समाज इसे सरस्वती देवी के मंदिर के रूप में मान्यता देता है।

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान इस संरचना को नुकसान पहुंचाया गया। इसके बाद 1401 ईस्वी में दिलावर खान गौरी ने भोजशाला के एक हिस्से में मस्जिद का निर्माण कराया। वहीं, 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने परिसर के दूसरे हिस्से में भी मस्जिद बनवाई।

ब्रिटिश काल में वर्ष 1875 में यहां खुदाई कराई गई थी, जिसमें देवी सरस्वती की एक प्रतिमा मिलने का दावा किया गया। बताया जाता है कि इस प्रतिमा को अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड लंदन ले गए। फिलहाल यह प्रतिमा लंदन के एक संग्रहालय में रखी गई है। हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग भी की गई है।

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