सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि घर और परिवार को संभालने वाली महिलाओं की भूमिका केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका योगदान समाज और राष्ट्र निर्माण में भी अहम होता है। अदालत ने कहा कि गृहिणियों के काम को उचित सम्मान मिलना चाहिए और उनके योगदान को आर्थिक मूल्य के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटना जैसे मामलों में घरेलू सेवाओं के नुकसान को मुआवजे के निर्धारण में महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है, जिससे ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों को उचित राहत मिल सके।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घर की जिम्मेदारियां निभाने वाली महिलाओं के काम को कमतर नहीं आंका जा सकता। अदालत के अनुसार, परिवार को संभालने और उसकी जरूरतों का ध्यान रखने में गृहिणियों की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी कमाने वाले सदस्य की होती है। पीठ ने कहा कि उनके श्रम और समर्पण का वास्तविक मूल्य तय करना आसान नहीं है, क्योंकि उनका योगदान परिवार की नींव को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है।
मुआवजे में होगा योगदान का मूल्यांकन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना से जुड़े मुआवजे के मामलों में गृहिणियों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, उनकी अनुमानित आय तय करते समय घर और परिवार के लिए किए गए कार्य, मेहनत और जिम्मेदारियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने माना कि गृहिणियां परिवार के संचालन में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं और उनके काम का महत्व किसी नियमित आय अर्जित करने वाले सदस्य से कम नहीं है।
पुराने हादसे से जुड़ा था मामला
यह मामला करीब दो दशक पुराने सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें उत्तराखंड में एक गृहिणी की जान चली गई थी। वाहन बीमित नहीं होने के कारण मुआवजे को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली। शुरुआती स्तर पर परिवार को सीमित मुआवजा दिया गया, जिसके खिलाफ परिजनों ने अधिक राहत की मांग करते हुए अदालत का रुख किया। विवाद का मुख्य मुद्दा यह था कि गृहिणी के योगदान और संभावित आय का आकलन किस आधार पर किया जाए। इसी मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के आर्थिक और सामाजिक योगदान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
मुआवजा बढ़ाने का दिया आदेश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणी के योगदान का कम आकलन किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि घर और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने वाली महिला के काम को मामूली नहीं माना जा सकता। पीठ ने मामले में दर्ज कई तथ्यों की त्रुटियों पर भी सवाल उठाए और पाया कि पहले के आकलन में गंभीर चूक हुई थी। इसके बाद कोर्ट ने पीड़ित परिवार को मिलने वाली मुआवजा राशि बढ़ाते हुए 6 लाख रुपये करने का आदेश दिया और संबंधित पक्ष को तय समय सीमा के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
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