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देश की राजधानी बनी ‘लापतागंज’, महज़ 36 दिनों में 2,475 लोग गायब—आखिरकार कब जागेगी दिल्ली पुलिस?

क्राइम दिल्ली भारत
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Photo Credit - AI

Delhi Missing Persons: दिल्ली, जहां हर गली और मोहल्ले में भीड़ तो देखने को मिलती है, लेकिन अब यहां का माहौल धीरे-धीरे असुरक्षित होता जा रहा है। यह शहर अब सिर्फ ट्रैफिक, मेट्रो और ऊंची इमारतों के लिए ही नहीं, बल्कि लापता लोगों के बढ़ते आंकड़ों के लिए भी जाना जा रहा है। पिछले 36 दिनों में 2,884 लोग अचानक गायब हो गए हैं, जिनमें से महज 409 ही अब तक वापस मिले हैं, जबकि बाकी लोगों का अब तक कोई पता नहीं चल सका है।

राजधानी में हर घंटे 3 लोग हो रहे हैं गायब

दिल्ली में हर दिन औसतन 82 लोग और हर घंटे लगभग 3 लोग लापता हो रहे हैं, जो केवल आंकड़े नहीं, बल्कि हजारों परिवारों का गहरा दर्द है। इन परिवारों की रातें बगैर नींद और दिन पुलिस थानों के चक्कर काटते हुए निकल रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन आंकड़ों में 616 बच्चे और 1,372 महिलाएं शामिल हैं। ये सच में डराने वाला है। बच्चे, जो सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं, और महिलाएं, जिनकी हिफाजत के दावे दिल्ली में हमेशा किए जाते हैं, असल में ये दोनों ही सबसे ज्यादा गायब हो रहे हैं। 17 साल का ऋतिक झा इसका साफ उदाहरण है। दिसंबर में वो घर से निकला और एक महीने से ज्यादा वक्त गुजर गया, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। परिवार का दुख सिर्फ बेटे के लापता होने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सिस्टम से भी जुड़ा है, जहां उम्मीद लेकर जाते हैं तो सिर्फ बहाने सुनने को मिलते हैं। न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी की 16 साल की सुराका भी ऐसे ही गायब हुई। ये बताता है कि अब गुमशुदगी सिर्फ किसी एक इलाके या तबके की नहीं रह गई।

पुलिस कर रही जांच में देरी, परिवार का आरोप

इन मामलों में एक बात साफ दिखती है, परिजन खुद अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कई परिवारों ने शिकायत की कि FIR तो दर्ज हो गई, लेकिन पुलिस ने शुरुआत में मामले को गंभीरता से नहीं लिया। CCTV फुटेज निकालना हो या कॉल डिटेल्स खंगालना, या फिर संभावित रास्तों का पता लगाना, जो काम पुलिस को करना चाहिए, वो सब परिवार खुद करते नजर आए। ऋतिक और सुराका के केस में तो परिजनों ने खुद फुटेज जुटाई, रास्ते तलाशे और पुलिस को सबूत दिए। ये सब न सिर्फ थकाने वाला है, बल्कि ये भी दिखाता है कि गुमशुदगी जैसे संवेदनशील मामलों में सिस्टम कितना सुस्त है।

लापता लोगों में एक हजार से अधिक महिलाएं शामिल

दिल्ली में लापता लोगों में 1,372 महिलाएं भी शामिल हैं, जो राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उठाए जा रहे सवालों को और गहरा कर रहे हैं। 36 दिनों में पुलिस केवल 17% लापता लोगों का ही पता लगा सकी, जबकि 83% अब भी ग़ायब हैं। इन घटनाओं में एक समानता यह है कि परिजनों को खुद ही मामले की छानबीन करनी पड़ रही है, और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। परिवारों का कहना है कि न केवल उन्हें अपने लापता सदस्यों की तलाश करनी है, बल्कि सिस्टम की अनदेखी से भी जूझना पड़ रहा है।

सवालों के घेरे में राजधानी की सुरक्षा

दिल्ली में गुमशुदगी की ये तस्वीर कई बड़े सवालों को जन्म देती है। क्या राजधानी की सुरक्षा इतनी कमजोर है कि हर घंटे लोग गायब हो रहे हैं? पुलिस के पास संसाधनों की कमी है या फिर इच्छाशक्ति की? और सबसे जरूरी, इन मामलों में जवाबदेही तय कौन करेगा? जब 36 दिनों में सिर्फ 17 फीसदी लोग ही वापस मिल पाए हों, तो ये मानना मुश्किल है कि सब कुछ ठीक चल रहा है। गुमशुदगी के मामलों को प्राथमिकता देनी होगी, शुरुआती 24 घंटे सबसे अहम माने जाएं और तकनीक का सही इस्तेमाल हो। नहीं तो दिल्ली ट्रैफिक और मेट्रो से आगे बढ़कर “लापतागंज” के नाम से जानी जाने लगेगी।

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