13 दिसंबर 2001, ये तारीख कोई यूं ही बीत जाने वाला दिन नहीं था। उस दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने पूरे भारत को हिला कर रख दिया। आतंकियों ने संसद पर हमला किया, और सच कहें तो, जैसे पूरे लोकतंत्र की नींव हिलाने की जिद ठान ली थी। अब, जब इस हमले की 24वीं बरसी आई, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, कई मंत्री, विपक्ष के नेता, और दर्जनों सांसद संसद भवन पहुंचे। सबने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। ये कोई सिर्फ रस्मी कार्यक्रम नहीं था। ये देश की याददाश्त, उसका जज़्बा और वो वादा था, कि भारत कभी आतंक के सामने घुटने नहीं टेकेगा।
कैसे रची गई साजिश
उस दिन सुबह, जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकी एक कार में संसद परिसर तक जा पहुंचे। कार पर गृह मंत्रालय और संसद के फर्जी स्टिकर चिपके थे, तो सुरक्षा घेरा पार करना उनके लिए ज़्यादा मुश्किल नहीं रहा। उसी वक्त लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही करीब 40 मिनट पहले ही स्थगित हो चुकी थी, लेकिन संसद परिसर में 100 से ज्यादा लोग मौजूद थे। इनमें गृह मंत्री एल.के. आडवाणी, रक्षा राज्य मंत्री हरिन पाठक जैसे बड़े नेता भी थे। आतंकियों के पास AK-47, ग्रेनेड लॉन्चर, पिस्तौल, हैंड ग्रेनेड सब कुछ था। उनका मकसद साफ था-जितना ज़्यादा नुकसान कर सकते हैं, उतना करो, और पूरे देश में डर फैलाओ।
सुरक्षा बलों ने दिखाई वीरता
सबसे पहले CRPF की कांस्टेबल कमलेश कुमारी ने खतरा भांप लिया। अलार्म बजाया, आतंकियों को रोकने की कोशिश की, और इसी दौरान वो शहीद हो गईं। इसके बाद दिल्ली पुलिस, संसद सुरक्षा सेवा और बाकी सुरक्षा बलों ने मोर्चा संभाला। मुठभेड़ जबरदस्त थी। एक आतंकी ने आत्मघाती जैकेट फोड़ दी, बाकी चार को भी सुरक्षाबलों ने मार गिराया। इस सबमें दिल्ली पुलिस के छह जवान, संसद सुरक्षा सेवा के दो जवान और एक माली शहीद हो गए। कुल नौ लोग अपनी जान गंवा बैठे, 17 से ज्यादा घायल हो गए। लेकिन उनकी बहादुरी की वजह से संसद में मौजूद सारे नेता, मंत्री, और बाकी लोग सुरक्षित बाहर निकल सके।
श्रद्धांजलि और राजनीतिक एकता का संदेश
अब 24 साल बाद, संसद परिसर में जब श्रद्धांजलि सभा हुई, तो सत्ता और विपक्ष के नेता एक साथ खड़े नजर आए। प्रधानमंत्री मोदी, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, किरेन रिजिजू, पीयूष गोयल, जितेंद्र सिंह, अर्जुन राम मेघवाल सब वहीं थे। ये पल बताता है कि जब बात देश और शहीदों के सम्मान की आती है, तो राजनीतिक मतभेद पीछे छूट जाते हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘सुरक्षा बलों ने अपने साहस से लोकतंत्र के मंदिर की रक्षा की, देश हमेशा उनका कर्जदार रहेगा।’
प्रियंका गांधी ने भी शहीदों और उनके परिवारों को सलाम किया कहा, ‘उनका बलिदान कभी भूलेगा नहीं।’
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिया शहीदों को श्रद्धांजलि
हमले की विरासत
संसद पर हमला महज आतंकी वारदात नहीं थी। उसने देश की आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद से निपटने की नीति, सब कुछ बदल दिया। इसके बाद संसद और बाकी संवेदनशील संस्थानों की सुरक्षा और कड़ी हो गई। आज, 24 साल बीतने के बाद भी, ये घटना हमें बार-बार याद दिलाती है, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की हिफाजत के लिए हमेशा चौकस रहना जरूरी है। शहीदों का बलिदान साफ संदेश देता है, आतंक कितना भी बर्बर क्यों न हो, भारत की एकता और लोकतंत्र उससे कहीं मजबूत है। ये दिन सिर्फ शोक का नहीं, बल्कि एक वादा दोहराने का है, कि जिन सपनों के लिए उन्होंने जान दी, उनका देश हमेशा रखवाला रहेगा।
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