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Pitru Paksha 2025: देश-विदेश से पितरों को तर्पण देने के लिए गया आने लगे श्रद्धालु, आज से शुरू होगा मेला, जानिए क्या है महत्व?

धर्म
pitru paksha mela starts today in gaya people have started coming from all over the country and abroad

Photo Credit - Rakesh kumar

हिंदू धर्म में पितरों का तर्पण काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे लेकर बिहार के गया जी में प्रत्येक साल देश-विदेश से लोग आते हैं। गया जी में पितृपक्ष महासंगम 2025 की तैयारी शुरू हो गई है। इस वर्ष पितृपक्ष मेला 6 सितंबर से 21 सितंबर तक निर्धारित है। पितृपक्ष मेला में गयाजी में देश-विदेश से हर साल 10 से 15 लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं।

पितरों के मुक्तिधाम गया जी में छह से 21 सितंबर तक पितृपक्ष मेले का आयोजन होगा। मेले का उद्घाटन शनिवार को शाम चार बजे किया जायेगा। उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा, बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह सहित कई सांसद, विधायक और स्थानीय जनप्रतिनिधि मौजूद रहेंगे।

जिला सूचना एवं जनसंपर्क पदाधिकारी ने बताया कि उद्घाटन के साथ ही 21 सितंबर तक प्रतिदिन देवघाट और सीता कुंड पर फल्गु महाआरती का आयोजन किया जायेगा, वहीं 7 से 21 सितंबर तक विष्णुपद मंदिर प्रांगण में प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन, प्रवचन और भागवत कथा का आयोजन होगा। अधिकारियों ने दावा किया है कि सुरक्षा, यातायात और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को लेकर सभी इंतजाम पूरे कर दिये गये हैं।

पितृपक्ष मेला के दौरान 54 वेदी स्थलों पर पिंडदान और कर्मकांड किया जाता है। जिनमें मुख्य रूप से विष्णुपद मंदिर परिसर में 16 वेदी, फल्गु नदी, सूर्यकुंड, गजाधर घाट, अक्षयवट, रामशिला, प्रेत शिला सहित अन्य वेदी स्थल शामिल हैं। इन स्थलों पर तालाबों की साफ-सफाई, बिजली, पानी, शौचालय और सड़क दुरुस्त करने का काम शुरू हो गया है।

श्राद्ध पक्ष (Pitru Paksha) में जल और तिल से ही तर्पण का विधान है। इसे तिलांजलि भी कहा जाता है। बता दें कि जल को शीतलता और त्याग का प्रतीक माना जाता है। यानी जो जन्म से मोक्ष तक साथ दे, वही जल है। वहीं तिल का संबंध सूर्य और शनि से है, जो पिता-पुत्र का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में हमारे पितरों (ancestors) का संबंध भी शनि से ही होता है। वहीं तिलों को देवान्न भी कहा गया है, जिससे पितरों को तृप्ति होती है। इसलिए जल और तिल के तर्पण को विशेष माना गया है।

गया जी में पितृ पक्ष का इतिहास बहुत पुराना है और इसका संबंध भगवान राम से है। गरुड़ पुराण के अनुसार, भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान गया जी में ही किया था। मान्यता है कि इस स्थान पर पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। गया जी को पितृ तीर्थ भी कहा जाता है, जहाँ हर साल लाखों लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करने आते हैं।

गयाजी में पिंडदान करने से 108 कुल और 7 पीढ़ियों का उद्धार होता है और पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में विराजमान हैं,इसलिए भी गयाजी में पिंडदान का विशेष महत्व है। त्रेतायुग में भगवान राम ने भी अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान गयाजी में ही किया था, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार, गयासुर नामक एक राक्षस था, जिसका शरीर पत्थर बनकर फैल गया था। भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया था कि उसके शरीर पर जहां भी पिंडदान किया जाएगा, वहां पितरों को मोक्ष मिलेगा। इसलिए, गयाजी में पिंडदान करना पितरों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

हर साल पितृपक्ष के दौरान, गयाजी में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला लगता है, जहाँ देश-विदेश से लोग पिंडदान और तर्पण के लिए आते हैं। इस दौरान, फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण का विशेष महत्व है।

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